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हाईकोर्ट ने रद्द किया राकेश कुमार का ऑर्डर

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 लखनऊ। कार्यकाल के अंतिम दिन अपने ही आठ दिन पहले के आदेश को पलटते हुए पूर्व डीआईओएस राकेश कुमार पांड़े ने मैनेजर के रूप में जिस शिक्षा माफिया ललित श्रीवास्तव के हस्ताक्षर को प्रमाणित कर दिया था, उसे हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने खारिज कर दिया है। नरही के सरस्वती विद्या कन्या इंटर कॉलेज के प्रकरण में जुगाड़ के चलते ही क्लर्क और बाद में मास्टर से माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड का सदस्य रहे शिक्षा माफिया ललित श्रीवास्तव को अचानक ही न केवल उसके प्रार्थना पत्र पर चुनाव कराया गया बल्कि पर्यवेक्षक बनाकर भेजी गई राजकीय गर्ल्स इंटर कॉलेज नही की प्रिंसिपल रागिनी मिश्रा की फर्जी आख्या मंगाई गई और आनन-फानन में ले देकर जाते-जाते मैनेजर बनाने का जो खेल पूर्व डीआईओएस राकेश कुमार पांड़े ने रचा था, उसे हाईकोर्ट ने विफल कर दिया है।
याचिकाकर्ता (सरस्वती विद्यालय कन्या इंटर कॉलेज, नरही , लखनऊ) की याचिका स्वीकार कर ली गई है और जिला विद्यालय निरीक्षक लखनऊ द्वितीय द्वारा एक जून 2026 को पारित आदेश रद्द कर दिया गया है।
22 मई 2026 को तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक राकेश कुमार ने कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव संबंधी कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
बाद में एक जून 2026 को राकेश कुमार पाड़े ने अपना पूर्व आदेश वापस लेकर ललित कुमार श्रीवास्तव के हस्ताक्षर प्रमाणित कर दिए। जाहिर है दोनों के बीच दूरभि संधि हुई होगी, तभी एक क्लास वन अफसर (पीईएस) अधिकारी राकेश कुमार ने इतना बड़ा काम कर दिया, जिसे हाईकोर्ट ने नियमों के तहत नहीं माना और एक झटके में ही पहले आदेश पर स्टे लगा दिया और बाद में उसे रद्द कर दिया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि एक जून 2026 का आदेश पारित करने से पहले उन्हें न तो नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर दिया गया। न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने कहा कि
बिना सुनवाई का अवसर दिए पारित किया गया आदेश कानून की दृष्टि में टिक नहीं सकता।
इसलिए 01 जून 2026 का आदेश निरस्त कर दिया है। उन्होंने नए डीआईओएस देवेंद्र कुमार पांडे के लिए आदेशित किया है कि सभी पक्षों को सुनकर, प्रशासन योजना और कानून के अनुसार नया आदेश पारित करेगा। बहरहाल पूर्व  डीआईओएस और देवीपाटन मंडल का डीडीआर और ज्वाइन्ट डायरेक्टर का चार्ज लेकर लखनऊ से विदा हुए राकेश कुमार का एक जून 2026 का आदेश अब प्रभावहीन हो गया है। ललित कुमार श्रीवास्तव के हस्ताक्षर सत्यापन के आधार पर जो स्थिति बनी थी, उसे कानूनी आधार नहीं रहा।

मैं कभी चपरासी नहीं रहा :  ललित श्रीवास्तव 
लखनऊ। एक जून 2026 को नरही स्थित सरस्वती विद्या कन्या विद्या कन्या इंटर कॉलेज के मैनेजर बनाए गए और हाईकोर्ट द्वारा पहले उस आदेश पर रोक लगाने और उसके बाद 21 जुलाई को पूर्व डीआईओएस राकेश कुमार के आदेश को ही खारिज करने के बाद एक बार फिर से चर्चा में आए ललित श्रीवास्तव ने लोकभारती से कहा कि उसकी पहली नियुक्ति लिपिक के पद पर राजकीय दीक्षा विद्यालय, सोनभद्र में हुई थी तथा वह चपरासी के पद पर कभी भी कार्यरत नहीं रहा और ना ही उसकी नियुक्ति कभी चपरासी के पद पर हुई थी। इसके अलावा ललित श्रीवास्तव सेंटिनियल 2011 तक क्लर्क के रूप में कार्यरत रहा तथा बाद में उसे सेंटिनियल इंटर कॉलेज में अध्यापक के रूप में मैनेजमेंट के माध्यम से नौकरी मिली, जिसके बाद वह सपा कार्यकाल में माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में सदस्य भी रह चुका है। सूत्र और मुकदमों की 30-32 पन्नों की पीडीएफ बताती है कि इसी दौरान ललित श्रीवास्तव पर न केवल कई गंभीर प्रकृति के मुकदमे दर्ज हुए बल्कि चार्जशीट भी हुई। इसी कारण से ही मुख्यालय भ्रष्टाचार निवारण संगठन उत्तर प्रदेश की ओर से पुलिस अधीक्षक ने प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा को एक पत्र लिखा। उस पत्र में बाकायदा कई सारे पत्रों और अनुस्मारक पत्र का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि ललित कुमार श्रीवास्तव पर मुकदमा अपराध संख्या 437/ 2020 धारा 13(1) ख सपठित धारा 13(2) भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम-1988 यथा संशोधित अधिनियम- 2018 थाना वजीरगंज कमिश्नरेट लखनऊ की विवेचना में अभियोग सक्षम न्यायालय में चलाए जाने हेतु भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-19 के अंतर्गत अभियोजन स्वीकृति प्रदान किए जाने की अपेक्षा की है, जो अभी तक अप्राप्त है। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय के निर्देश के क्रम में मुख्य सतर्कता आयुक्त नई दिल्ली द्वारा धारा-19 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के अंतर्गत अभियोजन स्वीकृत प्रदान किए जाने के संबंध में दिशा-निर्देश का भी जिक्र किया गया है। मुकदमे और चार्जशीट में ललित श्रीवास्तव के कुकृत्यों की विस्तार पूर्वक कच्चा चिट्ठा है, जिसमें और भी कई चीज स्पष्ट हो रही है। ऐसी स्थिति में ललित श्रीवास्तव के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति प्रदान करने के लिए फाइल दौड़ रही है और 28 जुलाई को एक अहम बैठक होने वाली है।

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